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महोदय, 26 जनवरी, 1950 को भारत में जनतांत्रिक प्रशासन की विधिवत संचालन की घोषणा की गई। इसी के साथ भारत सरकार ने राजभाषा विभाग के द्वारा राजभाषा के रूप में हिंदी का सरकारी कार्यों में अधिक-से-अधिक प्रयोग करने तथा करवाने पर बहुत बल दिया। राजभाषा विभाग ने इसके लिए कई प्रयास इस प्रयोजन के लिए प्रारंभ किए, जिससे भारत सरकार के सभी मंत्रालयों, विभागों, कार्यालयों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों आदि में हिंदी का अधिक-से-अधिक प्रयोग बढ़ता गया। राष्ट्र और जनहित के प्रति सचेत उच्चाधिकारियों ने स्वेच्छा से तथा सरकार के निर्देशों के अनुसार उत्तरदायित्व का वहन करते हुए हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। विभिन्न समितियों का गठन हुआ है। उसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अब मंत्रालय से लेकर नगर स्तर तक के कार्यालयों के उच्चाधिकारी तथा सभी कर्मचारी अपने को भारत सरकार के आदेशों-निदेशों के साथ अपनी समिति के निर्णयों का अनुपालन करने-कराने तथा कार्यान्वयन की प्रगति पर नज़र रखने लगे हैं। इससे एक लाभ यह भी हुआ है कि जो अधिकारी या कर्मचारी हिंदी नहीं जानते वे भी हिंदी कार्यान्वयन के कार्य में व्यवधान पैदा करने के स्थान पर सहयोग देने लगे हैं। राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रयोग का महत्व राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के दृष्टिकोण से भी बड़ा महत्वपूर्ण है। संसद तथा विधानसभाओं में विचार-विमर्श कर कानून बनाना और आदेश जारी करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है राजभाषा नीति का प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन करना व कराना। विश्व के प्रत्येक राष्ट्र की अपनी भाषा है, जो उसके इतिहास, संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जुड़ी हुई है, जिस पर उसे गर्व होता है। उसमें कार्य करना सुविधाजनक तो है ही, यह एक राष्ट्रीय स्वाभिमान, गौरव, स्वाधीनता तथा अपनी सार्वभौम सत्ता की अनुभूति कराता तथा करवाता है। यह कुछ सत्य भी है कि हमारे देश के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को अंग्रेजी में काम करने की आदत रही है, उन्हें अंग्रेजी को छोड़ने तथा राजभाषा हिंदी में काम करने में कष्ट होता है। वह आज भी स्वतंत्रता के 55 वर्ष बाद भी अंग्रेजी को पूरी तरह से छोड़ नहीं पाया है। इसीलिए संविधान में राजभाषा के रूप में हिंदी को स्थान दिए जाने एवं भारत प्रशासन के आदेशों के होते हुए भी वह हिंदी में काम नहीं कर पा रहा है।
महोदय, 26 जनवरी, 1950 को भारत में जनतांत्रिक प्रशासन की विधिवत संचालन की घोषणा की गई। इसी के साथ भारत सरकार ने राजभाषा विभाग के द्वारा राजभाषा के रूप में हिंदी का सरकारी कार्यों में अधिक-से-अधिक प्रयोग करने तथा करवाने पर बहुत बल दिया। राजभाषा विभाग ने इसके लिए कई प्रयास इस प्रयोजन के लिए प्रारंभ किए, जिससे भारत सरकार के सभी मंत्रालयों, विभागों, कार्यालयों तथा सरकारी प्रतिष्ठानों आदि में हिंदी का अधिक-से-अधिक प्रयोग बढ़ता गया। राष्ट्र और जनहित के प्रति सचेत उच्चाधिकारियों ने स्वेच्छा से तथा सरकार के निर्देशों के अनुसार उत्तरदायित्व का वहन करते हुए हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया। विभिन्न समितियों का गठन हुआ है। उसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि अब मंत्रालय से लेकर नगर स्तर तक के कार्यालयों के उच्चाधिकारी तथा सभी कर्मचारी अपने को भारत सरकार के आदेशों-निदेशों के साथ अपनी समिति के निर्णयों का अनुपालन करने-कराने तथा कार्यान्वयन की प्रगति पर नज़र रखने लगे हैं। इससे एक लाभ यह भी हुआ है कि जो अधिकारी या कर्मचारी हिंदी नहीं जानते वे भी हिंदी कार्यान्वयन के कार्य में व्यवधान पैदा करने के स्थान पर सहयोग देने लगे हैं। राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रयोग का महत्व राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के दृष्टिकोण से भी बड़ा महत्वपूर्ण है। संसद तथा विधानसभाओं में विचार-विमर्श कर कानून बनाना और आदेश जारी करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है राजभाषा नीति का प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन करना व कराना। विश्व के प्रत्येक राष्ट्र की अपनी भाषा है, जो उसके इतिहास, संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जुड़ी हुई है, जिस पर उसे गर्व होता है। उसमें कार्य करना सुविधाजनक तो है ही, यह एक राष्ट्रीय स्वाभिमान, गौरव, स्वाधीनता तथा अपनी सार्वभौम सत्ता की अनुभूति कराता तथा करवाता है। यह कुछ सत्य भी है कि हमारे देश के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को अंग्रेजी में काम करने की आदत रही है, उन्हें अंग्रेजी को छोड़ने तथा राजभाषा हिंदी में काम करने में कष्ट होता है। वह आज भी स्वतंत्रता के 55 वर्ष बाद भी अंग्रेजी को पूरी तरह से छोड़ नहीं पाया है। इसीलिए संविधान में राजभाषा के रूप में हिंदी को स्थान दिए जाने एवं भारत प्रशासन के आदेशों के होते हुए भी वह हिंदी में काम नहीं कर पा रहा है।
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